Praise of Cows in Brihat Parashara Smriti | बृहत्पराशरस्मृति में गोमहिमा

अनादेयतृणान्यत्त्वा स्रवन्त्युदिनं पयः।

तुष्टिदा देवतादीनां पूज्या गावः कथं न ताः॥

मनुष्यों के व्यवहार के अयोग्य सामान्य तृण-पत्तों-घास आदि को चरकर जो गौ निरंतर प्रतिदिन दूध का प्रस्रवण करती हैं तथा उस दूध से घी-दही आदि का निर्माण होकर देवता भी (आहुतियों से) संतुष्ट होते हैं, भला ऐसी वे गायें पूज्य कैसे नहीं हैं? अर्थात् वे सब प्रकार से पूज्य हैं।

स्पृष्टाश्च गावः शमयन्ति पापं

            संसेविताश्चोपयन्ति वित्तम्।

ता एव दत्तास्त्रिदिवं नयन्ति

         गोभिर्न तुल्यं धनमस्ति किञ्चित्॥

स्पर्श कर लेने मात्र से ही गौएँ मनुष्य के समस्त पापों को नष्ट कर देती हैं और आदरपूर्वक सेवन किये जाने पर अपार संपत्ति प्रदान करती हैं। वे ही गायें दान दिए जाने पर सीधे स्वर्ग ले जाती हैं, ऐसी गौओं के समान और कोई भी धन नहीं है।

यस्याः शिरसि ब्रह्मास्ते स्कन्धदेशे शिवः स्थितः।

पृष्ठे नारायणस्तस्थौ श्रुतयश्चरणेषु च ॥

या अन्या देवताः काश्चित् तस्या लोमसु ताः स्थिताः।

सर्वदेवमया गावस्तुष्येत् तद्भक्तितो हरिः॥    

जिसके सिर पर ब्रह्माजी का निवास है, कन्धे पर भगवान् शिव विराजमान रहते हैं, पीठ पर भगवान् नारायण स्थित रहते हैं और चारों वेद जिसके चारों चरणों में निवास करते हैं; शेष अन्य सभी देवगण जिसके रोम-समूह में स्थित रहते हैं, ऐसी सर्वदेवमयी गौओं की सेवा से भगवान् श्रीहरि सर्वथा प्रसन्न हो जाते हैं।

हरन्ति स्पर्शनात् पापं पयसा पोषयन्ति याः।

प्रापयन्ति दिवं दत्ताः पूज्या गावः कथं न ताः॥

जो गायें स्पर्श करने से सब पापों का हरण कर लेती हैं, दूध से सबका पालन-पोषण करती हैं, दान करने पर सीधे स्वर्ग की प्राप्ति करा देती हैं, भला ऐसी वे गायें कैसे पूजनीया नहीं हैं?

यत्खुराहतभूमेर्य उत्पद्यन्ते रजःकणाः।

प्रलीनं पातकं तैस्तु पूज्या गावः कथं न ताः॥

गायों के खुरों से आहत होने के कारण पृथ्वी से जो धूलिकण उत्पन्न होते हैं, उनके छूते ही सभी पाप ध्वस्त हो जाते हैं। ऐसी (महिमामयी) वे गायें कैसे पूजनीया नहीं हैं? अर्थात् सदा पूजनीया ही हैं।  

शकृन्मूत्रं हि यस्यास्तु पीतं दहति पातकम्।

किमपूज्यं हि तस्या गोरिति पाराशरोऽब्रवीत्॥

जिसके गोबर या मूत्र (पंचगव्य) का पान करने से सारे पाप भस्म हो जाते हैं, उन गायों से प्राप्त कौन-सा द्रव्य है जो अपूज्य है? अर्थात् सब कुछ पूज्य ही है – ऐसा महर्षि पराशर जी का कहना है।

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गावो देयाः सदा रक्ष्याः पाल्याः पोष्याश्च सर्वदा।

ताडयन्ति च ये पापा ये चाक्रोशन्ति ता नराः॥

नरकाग्नौ प्रपच्यन्ते गोनिःश्वासप्रपीडिताः।

सपलाशेन शुष्केण ता दण्डेन निवर्तयेत्॥

गच्छ गच्छेति तां ब्रूयान्मा मा भैरिति वारयेत्।

संस्पृशन् गां नमस्कृत्य कुर्यात् तां च प्रदक्षिणम्॥

प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तद्वीपा वसुन्धरा।

गौओं का सदा दान करना चाहिए, सदा उनकी रक्षा करनी चाहिए और सदा उनका पालन-पोषण करना चाहिए। जो मूर्ख इन्हें डाँटते तथा मारते-पीटते हैं, वे गौओं के दुःखपूर्ण निःश्वास से पीड़ित होकर घोर नरकाग्नि में पकाये जाते हैं। (यदि कोई मारने वाली गाय घर में आ गयी है तो) उसे सूखे पलाश के डंडे से हटा दे और उससे यह कहे कि तुम डरो मत, वापस चली जाओ। गाय को देखने पर छूते हुए उन्हें प्रणाम करे और उनकी प्रदक्षिणा करे। ऐसा करने से उसने मानो समस्त सप्तद्वीप वाली पृथ्वी की ही परिक्रमा कर ली।

तृणोदकादिसंयुक्तं यः प्रदद्यात् गवाह्निकम्।

सोऽश्वमेधसमं पुण्यं लभते नात्र संशयः॥

जो गौओं को भोजन के लिए प्रतिदिन जल और तृण सहित कुछ भोजन प्रदान करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ करने के समान फल की प्राप्ति होती है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

गवां कण्डूयनम् स्नानं गवां दानसमं भवेत्।

तुल्यं गोशतदानस्य भयतो गां प्रपाति यः॥

गौओं को खुजलाना तथा उन्हें स्नान कराना भी गोदान के समान फल वाला होता है। जो भय से दुखी (भयग्रस्त) एक गाय की रक्षा करता है, उसे सौ गोदान का फल प्राप्त होता है।

पृथिव्यां यानि तीर्थानि आसमुद्रं सरांसि च।

गवां शृङ्गोदकस्नानकलां नार्हन्ति षोडशीम्॥

पृथ्वी पर समुद्र से लेकर जितने भी बड़े तीर्थ-सरिता-सरोवर आदि हैं, वे सब मिलकर भी गौ के सींग के जल से स्नान करने के सोलहवें भाग के तुल्य भी नहीं होते।

पातकानि कुतस्तेषां येषां गृहमलंकृतम्।

सततं बालवत्साभिर्गोभिः श्रीभिरिव स्वयम्॥

जिनके घर साक्षात् स्वयं लक्ष्मी स्वरूपा सवत्सा गौओं से अलंकृत हैं उनके पाप-ताप भला कैसे टिक सकते हैं?

ब्राह्मणाश्चैव गावश्च कुलमेकं द्विधा कृतम्।

तिष्ठन्त्येकत्र मन्त्रास्तु हविरेकत्र तिष्ठति॥

ब्राह्मण और गौएँ वस्तुतः एक ही कुल के हैं जिन्हें दो भागों में विभक्त कर दिया गया है। एक ओर तो ब्राह्मण में मंत्र स्थित हैं और दूसरी ओर गौ में हविष्य स्थित है।

गोभिर्यज्ञाः प्रवर्तन्ते गोभिर्देवाः प्रतिष्ठिताः।

गोभिर्वेदाः समुद्गीर्णाः षडङ्गाः सपदक्रमाः॥

गौओं से ही यज्ञ की पूर्ति होती है और गौओं से ही देवताओं की प्रतिष्ठा होती है तथा गौओं से ही पद, क्रम एवं व्याकरण आदि छः अंगों सहित सभी वेद अभिव्यक्त हुए।

सौरभेयास्तु यस्याग्रे पृष्ठतो यस्य ताः स्थिताः।

वसन्ति हृदये नित्यं तासां मध्ये वसन्ति ये ॥

ते पुण्यपुरुषाः क्षोण्यां नाकेऽपि दुर्लभाश्च ते।

ये गोभक्तिकरा नित्यं विद्यन्ते ये च गोप्रदाः ॥

गौएँ जिनके आगे, पीछे, ह्रदय के सामने नित्य निवास करती हैं और गौओं के बीच में ही जो निवास करते हैं तथा जो गौओं की नित्य भक्ति करते हैं, उपासना करते तथा प्रतिदिन गौओं का दान करते हैं, ऐसे पुण्यात्मा पुरुष पृथ्वी पर भी दुर्लभ हैं और स्वर्ग में भी दुर्लभ हैं। 

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